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एक कदम एक प्रयास समृद्ध बनाये समाज : पवार समाज के समस्त व्यापारी बंधुओ के लिए एक हमारे पूज्य राजा भोज के नाम के साथ समाज के लिए सेंट्रलाइज्ड ऑनलाइन सिस्टम – बिज़नेस डायरेक्टरी (www.bhojvyapaar.com) का निर्माण किया गया है जिससे समाज के समस्त व्यापारी गण अपने बिज़नेस की समस्त जानकारी ऑनलाइन कर सकते है और सभी सामाजिक व्यक्ति इसका लाभ ले सकते है !

समृद्धि के पथ पर बढ़ते समाज में हमारे व्यापारी बंधुओ का विकास अन्य समाजो की तरह तेजी से नहीं हो पा रहा है न ही हम पवार समाज व्यापार के क्षेत्र में अपनी सुदृढ़ पहचान स्थापित कर पाए है.. कही न कही हमारी समाज का व्यापारी वर्ग आकार में विशालकाय होने के बावजूद भी पिछड़ा हुआ है और जिसे हम सब को मिलकर आगे बढ़ाना होगा उन्नत बनाना होगा.. क्योकि हम सभी के परिवारों से कोई न कोई तो अवश्य ही व्यापार से जुड़ा हुआ है .. तो हम सब को आगे आना होगा एक दूसरे का सहयोग करना होगा और समाज के व्याप्परी वर्ग को समृद्ध और विकासशील बनाना होगा !!

www.bhojvyapaar.com एक ऑनलाइन पोर्टल है जहा पवार समाज के विभिन्न क्षेत्रो में निवासरत व्यवसायी बंधू चाहे शहरी क्षेत्र हो या ग्रामीण क्षेत्र हो सभी अपनी व्यवसाय सम्बन्धी जानकारी चाहे वो कोई सेवा / वस्तु (product / service) हो क्षेत्रवार ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करवा सकते है और अपने बिज़नेस को ऑनलाइन अस्तित्व में ला सकते है.. जिससे उनके बिज़नेस को कोई भी व्यक्ति कही से भी जानकारी देखकर उनसे संपर्क कर सकता है और दी जाने सर्विस का उपयोग कर सकता है इस तरह व्यापारी वर्ग को अपने व्यापार को सुदृढ़ बनाने में सकारत्मक सहयोग और समृद्धि मिलेगी !

www.bhojvyapaar.com इस पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करने के उपरांत आपको सम्बंधित व्यक्ति जो आपसे सर्विस लेना चाहे आपकी सर्विस और क्षेत्र के अनुसार ऑनलाइन अपने मोबाइल / लैपटॉप / कंप्यूटर के माध्यम से आसानी से किसी भी समय किसी भी क्षेत्र से ढूंढ सकता है और आपके दिए गए सम्पर्क जानकारी : मोबाइल/ फ़ोन / ईमेल/ व्हाट्सप्प के माध्यम से संपर्क कर सकता है ! इस प्रकार आपकी जानकारी और आपके बिज़नेस का दायरा किसी एक क्षेत्र में सिमित न रहकर बढ़ता जायेगा !

सभी सामाजिक व्यक्ति अपने समाज के व्यापारी वर्ग की कैसे सहायता कर सकते है : एक सामाजिक व्यक्ति होने के दायित्व के साथ हम सिर्फ इतना करे की जब भी हमें किसी भी प्रकार की service / product लेना हो तो एक बार जरूर देखे की अपने क्षेत्र में हमारा कोई व्यक्ति यह service / product का बिज़नेस कर रहा हो तो उससे जरूर संपर्क करे .. इसके लिए आपको सिर्फ अपने मोबाइल जो आमतौर हम सभी उपयोग करते है www .bhojvyapaar .com पर जाये ..

1 . अपनी सर्विस चुने

2 . अपने क्षेत्र चुने

3 . सर्च करे

और सम्बंधित व्यक्ति से service / product की जानकरी प्राप्त करले !!

समस्या : समाज के व्याप्परी वर्ग के लिए ऑनलाइन पोर्टल क्यों ???.. क्योंकि हमे अपने आसपास के अपने समाज के लोगो की ही पूरी सही जानकारी नहीं मिल पाती की कोईयन सा व्यक्ति किस प्रकार का व्यवसाय करता है .. या पता हो भी तो उनसे किसी कारणवश संपर्क नहीं हो पता है .. इस स्थिति में हम सभी न चाहते हुए भी किसी अनजान व्यक्ति से लेनदेन करते है और अपने किसी समाजिक व्यापारी भाई का नुक्सान करा देते है .. इस ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से सभी बिज़नेस करने वाले व्यक्ति की समस्त जानकारी क्षेत्रवार होगी जिससे सभी को लाभ होगा और आपसी सामजस्य समाज में लेनदेन और सहयोग की भावना को बल मिलगा !

हमारा उद्देश्य : समाज के विभिन्न क्षेत्रो के समाजिक व्यक्ति और समाज के व्यवसायी बंधुओ के आपसी लेनदेन बढे हम सब मिलकर प्रयास करे की समाज के बीच service / product लेने का प्रयास करे जिससे हमारे व्यापारी वर्ग भी सुदृढ़ हो उनका परिवार भी समृद्ध हो और समाज के बीच service / product लेने सामाजिक सरोकार भी बढ़े.. सबका विकास होगा तभी समृद्ध समाज होगा !

हमारे वर्तमान कार्यक्षेत्र और सेवाएं :

Areas : BHOPAL, MANDIDEEP,BUDHNI,HOSANGABAD,SARNI,BETUL,MULTAI,CHHINDWARA,NAGPUR,BALAGHAT,JABALPUR,INDORE etc..!

Services/product : किसी भी प्रकार की service / product / business को ऑनलाइन रजिस्टर्ड किया जा जायेगा ! (ex : Photographer, DJ, Tent, Catering, Repair Shop, Car service, Life insurance, Motor Insurance, Builders, Constructors, Tutor, School, College, Doctor- Clinik, Hospital, Shop, Carpenter, Electrician, Plumber, Cleaner, Driver, Helper, Mechanics, Medical shop, workers, Beauty Parlors, yoga, Brokers, Finance, Decorators, Lighting, Printing , sales and support etc..)

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Register and become BHOJ Vyapaari 😊

Please contact for Registration : Mahendra Digarse -8880842536 & Chandan Pawar – 8880842536

🙏Jai raja BHOJ🙏

पुनर्विवाह

पुनर्विवाह : पवार समाज के ऐसे परिवारजन या व्यक्ति (युवक -युवतिया) जिनके जीवनसाथी की या तो मृत्यु हो चुकी है या फिर किसी और वजह से अपने जीवनसाथी से भिन्न एकल जीवन यापन करने पर विवश है…और अपने दायित्वों का निर्वाह हेतु जीवन में नयी शुरुवात करना चाहते है.. ऐसे समाजिक व्यक्तियों के जीवन सुधार हेतु एक सकारत्मक सामाजिक पहल  “पुनर्विवाह ” – पवार समाज के विभिन्न क्षेत्रो में निवासरत परिवारों में ऐसे भाई बहिन जो अपने जीवन की नयी शुरुवात करना चाहते है उन्हें पवारमट्रीमोनिअल एक सामूहिक मंच प्रदान करने का प्रयास करता है जिससे पुर्नविवाह समबन्धित सदस्य अपनी जानकारी हमें दे सकते है और हम ऐसे सभी सदस्यों जो विभिन्न क्षेत्रो से होंगे उन्हें अपना जीवनसाथी तलाशने में सहायक भूमिका अदा कर पुर्नविवाह समबन्धित सदस्यों की जानकारी साझा की जाएगी!! जिससे “पुर्नविवाह” में सहायता हो और किसी व्यक्ति के जीवन को नयी शुरुवात एवं समाज को  एक नया खुशहाल परिवार मिल सके…!!
पुनर्विवाह पर विशेष ध्यान – समाज को एक व्यक्ति के जीवन को सुधारने में पूर्णतः समर्थन और सहयोग करना चाहिए।

रजिस्ट्रेशन व् प्रक्रिया – अधिक जानकारी हेतु संपर्क करे : (महेंद्र डिगरसे :8880842536 / चन्दन पवार:8880686073 )

एक तरफ अपना समाज तरक्की कर रहा है एक नयी उचाईयों तक पहुंच रहा है अपने “राजा भोज के वंशज” होने पे बड़ा फक्र होता है लेकिन दूसरी और समाज के कुछ कड़वे सच भी है जिन्हे हम देखना नहीं चाहते | उनसे आँखें मिलाता हूँ तो परेशान हो जाता हूँ | वैसे हमारा सीधे लेना देना नहीं है  हम ही इस बारे में क्यों सोचें हमारी ज़िन्दगी तो ठीक ठाक चल रही है हमें क्या फर्क पड़ता है – लेकिन फर्क पड़ता है | हम भी तो इसी समाज का एक हिस्सा हूँ | हर बात के हमसे आपसे होकर ही तो गुजरती है … आज अगर राजा भोज ज़िंदा होते तो हम उन्हें क्या जवाब देते |||
समाज में विधवाओं की दशा आधुनिक काल में भी बड़ी शोचनीय है । अतः विधवा पुनर्विवाह की समस्या किसी न किसी रूप में अब भी उपस्थित है अपने समाज में जिसे मिलकर दूर करने का मिलकर प्रयास करना है |

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पुनर्विवाह इच्छुक समाज का व्यक्ति इस लिंक पर जा के अपना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करे : http://www.pawarmatrimonial.com/register/

ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के उपरांत आपको आपकी ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन, लॉगिन अवं प्रोफाइल डिटेल्स रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर हमारे द्वारा भेज दी जाएगी |

आपको पावरमैट्रीमोनिअल के व्हाट्सअप्पग्रूप में जोड़ लिया जाएगा जिसमे वैवाहिक जानकारी शेयर की जाती है |

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श्री बलराम डाहरे : जीवित राजा भोज

झूठी पड़ी कहावत –“कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली”

हमारे अपने बीच के ही साथी श्री बलराम डाहरे ने इस कहावत को ही झूठा साबित कर दिखाया है। एक रंक ने आज वह कर दिखाया है जो वर्षों पूर्व किसी राजा ने कर दिखाया था। मृत राजा भोज की कथा कहानी तो आपने सुन रखी है पर हमारे बीच जिन्दा राजा भोज को बहुत कम लोग जानते है। श्री बलराम डाहरे को जीवित राजा भोज कहना अतिशयोक्ति हो सकती है पर उनके लिए इससे उपयुक्त और कोई विशेषण प्रतीत ही नहीं होता। राजा भोज द्वारा भोपाल के निकट भोजपुर में शिव मंदिर बनाया गया था जिसे मालवा का सोमनाथ कहा जाता है। भोपाल के ही समीप मण्डीदीप स्थित 55 सीढ़ी मंदिर प्रांगण में श्री बलराम डाहरे द्वारा 65 फ़ीट ऊँचा श्री राम जानकी मंदिर बनाकर अपने पूर्वज राजा भोज की परंपरा को आगे बढ़ाया है और इस कहावत को झूठा साबित कर दिया है जो इतिहास प्रसिद्ध है -कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली। इस मंदिर में जयपुर से मंगवाया गया संगमरमर का साढ़े चार फ़ीट ऊँचा राम दरबार स्थापित है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ से राजा भोज निर्मित भोजपुर शिव मंदिर दिखाई देता है। बैहर बालाघाट के राम मंदिर से भी भव्य और मनोरम यह मंदिर पवारों की शान में चार चाँद लगा रहा है। भोपाल आते जाते इसका दर्शन लाभ लिया जा सकता है। य़ह मंदिर रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड से मात्र एक डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस महान कार्य के एवज में श्री बलराम डाहरे को कभी बधाई देने का मन करे या उनसे बात करने का मन करें तो उनका मोबाइल न है -08889913842 ,09009408298

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जानिए क्षत्रिय पवार समाज के सभी गोत्र एवं बरग (वर्ण – गोत्र के अनुसार) बहुत ही रोचक जानकारी जिनका विवाह समबन्ध बनाने के पूर्व अत्यधिक ध्यान दिया जाता है जानिए हमारे समाज में कितने गोत्र है और हर गोत्र का कौन सा बरग होता है…

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क्षत्रिय वह है, जो ज्ञान से परिपूर्ण हो और पीठ पर शस्त्र हो।

क्षत्रिय दोहरा धर्म निभाते हैं। वे अपनी तो रक्षा करते ही हैं दूसरों की रक्षा की
भी जिम्मेदारी निभाते हैं।

क्षत्रिय संगत पर जोर देते हुए कहा कि जैसी संगत होगी वैसे ही
आचार-विचार होंगे। हमें ऎसे व्यक्ति की संगत करनी चाहिए जो आदर्श हो। सही दिशा बतानेवाला हो।

क्षत्रिय समाज के लोगों से अहंकार से दूर हटकर सभी को साथ लेकर चलने पर जोर दिया। समाज के हर
व्यक्ति को सुनना चाहिए भले ही वह गरीब क्यों न हो। क्षत्रियों का
धर्म गायों को रक्षा करना भी रहा है।

हममें क्षमता और शक्ति खून और संस्कार से मिलती है। उन्होंने
क्षत्रियों को देश का सैनिक बताते हुए की , हम क्षत्रिय हैं हमें अपने दिमाग की
तलवार का इस्तेमाल उचित जगह करने की जरूरत है। स्वाभिमान ही क्षत्रिय की पहचान है।

क्षत्रिय शब्द की व्युत्पत्ति की दृष्टि से अर्थ है जो दूसरों को क्षत से बचाये। क्षत्रिया, क्षत्राणी हिन्दुओं के चार वर्णों में से दूसरा वर्ण है। इस वर्ण के लोगों का काम देश का शासन और शत्रुओं से उसकी रक्षा करना माना गया है। भारतीय आर्यों में अत्यंत आरम्भिक काल से वर्ण व्यवस्था मिलती है, जिसके अनुसार समाज में उनको दूसरा स्थान प्राप्त था। उनका कार्य युद्ध करना तथा प्रजा की रक्षा करना था। ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार क्षत्रियों की गणना ब्राहमणों के बाद की जाती थी, परंतु बौद्ध ग्रंथों के अनुसार चार वर्णों में क्षत्रियों को ब्राह्मणों से ऊँचा अर्थात् समाज में सर्वोपरि स्थान प्राप्त था। गौतम बुद्ध और महावीर दोनों क्षत्रिय थे और इससे इस स्थापना को बल मिलता है कि बौद्ध धर्म और जैन धर्म जहाँ एक ओर समाज में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के दावे के प्रति क्षत्रियों के विरोध भाव को प्रकट करते हैं, वहीं दूसरी ओर पृथक् जीवन दर्शन के लिए उनकी आकांक्षा को भी अभिव्यक्ति देते हैं। क्षत्रियों का स्थान निश्चित रूप से चारों वर्णों में ब्राह्मणों के बाद दूसरा माना जाता था।

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क्षत्रिय पवार समाज के सभी सदयस्यो के लिए महत्वपूर्ण जानकारी !!!
समाज के सभी विवाह योग्य युवक युवतियों की जानकारी संग्रह करने के लिए www.pawarmatrimonial.com ऑनलाइन पोर्टल (website) का निर्माण किया गया है!
इस प्रक्रिया में जो जानकारी अब तक बुक या पेपर पर संग्रह की जाती थी, उसमे विभिन्न प्रकार की समस्या जैसे की सभी ग्रामीण छेत्रो से जानकारी ठीक तरह से मिल नहीं पति थी या किसी सदस्य की जानकारी में कोई त्रुटि हो गयी हो तो उसे ठीक करने में बहुत समय लगता था, या अगर कोई जैसे फोटो संलग्न नहीं है तो उसे दूसरी बार प्रिंट में ही ठीक किया जा सकता (इत्यादि)!
और इस जानकारी को शेयर करने, इसमें सुधर करने या आदान प्रदान में भी काफी कठिनाई होती है |
इन सभी बातो को ध्यान में रखते हुए हमने सारी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है ताकि ग्रामीण हो या शहरी छेत्र सभी विवाह योग्य सदस्य अपने रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन करा सके, और जब भी कोई भी बदलाव करना हो तो स्वयं ही तुरंत ठीक कर सकते है !
पवार समाज के विवाह योग्य सभी सदस्य अपने रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन निचे दिए गए लिंक पर जाकर आसानी से करा सकते है, यह पूरी तरह से मुफ्त है http://www.pawarmatrimonial.com/register/
रजिस्ट्रेशन से सम्बंधित किसी भी प्रकार की जानकारी या सहायता के लिए निचे दिए नंबर पर संपर्क करे !!
चन्दन पवार : 8880686073 & महेंद्र डिगरसे : 8880842536
आग्रह : हमारे द्वारा समाज की प्रगति में सहायता करने का प्रयास किया जा रहा है जिसमे आप सभी पवार समाज के सदस्यों का सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है !! कृपया ज्यादा से ज्यादा शेयर करे ताकि इसका अधिकतम लाभ मिल सके!!
Registration link : http://www.pawarmatrimonial.com/register/
Website link : http://www.pawarmatrimonial.com
Developed and Maintained By : Mahendra Digarse & Chandan Pawar
धन्यवाद् !

updeshya

समाजसेवा वैयक्तिक आधार पर, समूह अथवा समुदाय में व्यक्तियों की सहायता करने की एक प्रक्रिया है, जिससे व्यक्ति अपनी सहायता स्वयं कर सके। इसके माध्यम से सेवार्थी वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में उत्पन्न अपनी कतिपय समस्याओं को स्वयं सुलझाने में सक्षम होता है। अत: हम समाजसेवा को एक समर्थकारी प्रक्रिया कह सकते हैं। यह अन्य सभी व्यवसायों से सर्वथा भिन्न होती है, क्योंकि समाज सेवा उन सभी सामाजिक, आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक कारकों का निरूपण कर उसके परिप्रेक्ष्य में क्रियान्वित होती है, जो व्यक्ति एवं उसके पर्यावरण-परिवार, समुदाय तथा समाज को प्रभावित करते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता पर्यावरण की सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक शक्तियों के बाद व्यक्तिगत जैविकीय, भावात्मक तथा मनोवैज्ञानिक तत्वों को गतिशील अंत:क्रिया को दृष्टिगत कर ही सेवार्थी की सेवा प्रदान करता है। वह सेवार्थी के जीवन के प्रत्येक पहलू तथा उसके पर्यावरण में क्रियाशील, प्रत्येक सामाजिक स्थिति से अवगत रहता है क्योंकि सेवा प्रदान करने की योजना बताते समय वह इनकी उपेक्षा नहीं कर सकता।

समाजसेवा का उद्देश्य व्यक्तियों, समूहों और समुदायों का अधिकतम हितसाधन होता है। अत: सामाजिक कार्यकर्ता सेवार्थी को उसकी समस्याओं का समाधान करने में सक्षम बनाने के साथ उसके पर्यावरण में अपेक्षित सुधार लाने का प्रयास करता है और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के निमित्त सेवार्थी की क्षमता तथा पर्यावरण की रचनात्मक शक्तियों का प्रयोग करता है। समाजसेवा सेवार्थी तथा उसके पर्यावरण के हितों में सामजस्य स्थापित करने का प्रयास करती है। समाजसेवा का वर्तमान स्वरूप निम्नलिखित जनतांत्रिक मूल्यों के आधार पर निर्मित हुआ है :

(1) व्यक्ति की अंतनिर्हित क्षमता, समग्रता एवं गरिमा में विश्वास-समाजसेवा सेवार्थी की परिवर्तन और प्रगति की क्षमता में विश्वास करती है।

(2) स्वनिर्णय का अधिकार – सामाजिक कार्यकर्ता सेवार्थी को अपनी आवश्यकताओं और उनकी पूर्ति की योजना के निर्धारण की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करता है। निस्संदेह कार्यकर्ता सेवार्थी को स्पष्ट अंतर्दृष्टि प्राप्त करने में सहायता करता है जिससे वह वास्तविकता को स्वीकार कर लक्ष्यप्राप्ति की दिशा में उन्मुख हो।

(3) अवसर की समानता में विश्वास – समाज सेवा सबको समान रूप से उपलब्ध रहती है और सभी प्रकार के पक्षपातों और पूर्वाग्रहों से मुक्त कार्यकर्तासमूह अथवा समुदाय के सभी सदस्यों को उनकी क्षमता और आवश्यकता के अनुरूप सहायता प्रदान करता है।

(4) व्यक्तिगत अधिकारों एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों में अंतस्तंबद्क्त व्यक्ति के स्वनिर्णय एवं समान अवसरप्राप्ति के अधिकार, उसके परिवार, समूह एवं समाज के प्रति उसके उत्तरदायित्व से संबंद्ध होते हैं। अत: सामाजिक कार्यकर्ता व्यक्ति की अभिवृत्तियों एवं समूह तथा समुदाय के सदस्यों की अंत:क्रियाओं, व्यवहारों तथा उनके लक्ष्यों के निर्धारण को इस प्रकार निदेशित करता है कि उनके हित के साथ उनके बृहद् समाज का भी हितसाधन हो।

समाजसेवा इस प्रयोजन के निमित्त स्थापित विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से वहाँ नियुक्त प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा प्रदान की जाती है। कार्यकर्ताओं का ज्ञान, अनुभव, व्यक्तिगत कुशलता एक सेवा करने की उनकी मनोवृत्ति सेवा के स्तर की निर्धारक होती है। कार्यकर्ता में व्यक्तिविकास की संपूर्ण प्रक्रिया एवं मानव व्यवहार तथा समूह व्यवहार की गतिशीलता तथा उनके निर्धारक तत्वों का सम्यक्‌ ज्ञान समाजसेवा की प्रथम अनिवार्यता है। इस प्रकार ज्ञान पर आधारित समाजसेवा व्यक्ति की समूहों अथवा समुदाय की सहज योग्यताओं तथा सर्जनात्मक शक्तियों को उन्मुक्त एवं विकसित कर स्वनिर्धारित लक्ष्य की दिशा में क्रियाशील बनती है, जिससे वे अपनी संवेगात्मक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक, एवं सामाजिक समस्याओं का समाधान ढूँढने में स्वयं सक्रिय रूप से प्रवृत्त होते हैं। सेवार्थी अपनी दुर्बलताओं-कुंठा, नैराश्य, हीनता, असहायता एवं असंपृक्तता की भावग्रंथियों और मानसिक तनाव, द्वंद्व तथा विद्वेषजनित आक्रमणात्मक मनोवृत्तियों का परित्याग कर कार्यकर्ता के साथ किस सीमा तक सहयोग करता है, यह कार्यकर्ता और सेवार्थ के मध्य स्थापित संबंध पर निर्भर करता है। यदि सेवाथीं समूह या समुदाय है तो लक्ष्यप्राप्ति में उसके सदस्यों के मध्य वर्तमान संबंध का विशेष महत्व होता है। समाजसेवा में संबंध ही संपूर्ण सहायता का आधार है और यह व्यावसायिक संबंध सदैव साभिप्रय होता है। प्रकार

समाजसेवा के तीन प्रकार होते हैं-

(1) वैयक्तिक समाजसेवा – इस प्रक्रिया के माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की सहायता वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में उत्पन्न उसकी कतिपय समस्याओं के समाधान के लिए करता है जिसमें वह समाज द्वारा स्वीकार्य संतोषपूर्ण जीवन व्यतीत कर सके।

(2) सामूहिक समाजसेवा – एक विधि है जिसके माध्यम से किसी सामाजिक समूह के सदस्यों की सहायता एक कार्यकर्ता द्वारा की जाती है, जो समूह के कार्यक्रमों और उसके सदस्यों की अंत:क्रियाओं को निर्देशित करता है। जिससे वे व्यक्ति की प्रगति एवं समूह के लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान कर सकें।

(3) सामुदायिक संगठन – वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक संगठनकर्ता की सहायता से एक समुदाय के सदस्य को समुदाय और लक्ष्यों से अवगत होकर, उपलब्ध साधनों द्वारा उनकी पूर्ति आवश्यताओं के निमित्त सामूहिक एवं संगठित प्रयास करते हैं।

इस प्रकार समस्त सेवा की तीनों विधियों का लक्ष्य व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति है। उनकी सहायता इस प्रकार की जाती है कि वे अपनी आवश्यकताओं, व्यक्तिगत क्षमता तथा प्राप्य साधनों से भली-भाँति अवगत होकर प्रगति कर सके तथा स्वस्थ समाज व्यवस्था के निर्माण में सहायक हों।

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परमार / पवार वंशीय राजाओं ने मालवा के एक नगर धार को अपनी राजधानी बनाकर 8वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक राज्य किया था। उनके ही वंश में हुए परमार /पवार वंश के सबसे महान अधिपति महाराजा भोज ने धार में 1000 ईसवीं से 1055 ईसवीं तक शासन किया।

महाराजा भोज से संबंधित 1010 से 1055 ई. तक के कई ताम्रपत्र, शिलालेख और मूर्तिलेख प्राप्त होते हैं। भोज के साम्राज्य के अंतर्गत मालवा, कोंकण, खानदेश, भिलसा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़ एवं गोदावरी घाटी का कुछ भाग शामिल था। उन्होंने उज्जैन की जगह अपनी नई राजधानी धार को बनाया।

ग्रंथ रचना : राजा भोज खुद एक विद्वान होने के साथ-साथ काव्यशास्त्र और व्याकरण के बड़े जानकार थे और उन्होंने बहुत सारी किताबें लिखी थीं। मान्यता अनुसार भोज ने 64 प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की थीं तथा उन्होंने सभी विषयों पर 84 ग्रंथ लिखे जिसमें धर्म, ज्योतिष, आयुर्वेद, व्याकरण, वास्तुशिल्प, विज्ञान, कला, नाट्यशास्त्र, संगीत, योगशास्त्र, दर्शन, राजनीतिशास्त्र आदि प्रमुख हैं।

उन्होंने ‘समरांगण सूत्रधार’, ‘सरस्वती कंठाभरण’, ‘सिद्वांत संग्रह’, ‘राजकार्तड’, ‘योग्यसूत्रवृत्ति’, ‘विद्या विनोद’, ‘युक्ति कल्पतरु’, ‘चारु चर्चा’, ‘आदित्य प्रताप सिद्धांत’, ‘आयुर्वेद सर्वस्व श्रृंगार प्रकाश’, ‘प्राकृत व्याकरण’, ‘कूर्मशतक’, ‘श्रृंगार मंजरी’, ‘भोजचम्पू’, ‘कृत्यकल्पतरु’, ‘तत्वप्रकाश’, ‘शब्दानुशासन’, ‘राज्मृडाड’ आदि ग्रंथों की रचना की। ‘भोज प्रबंधनम्’ नाम से उनकी आत्मकथा है। हनुमानजी द्वारा रचित रामकथा के शिलालेख समुद्र से निकलवाकर धारा नगरी में उनकी पुनर्रचना करवाई, जो हनुमान्नाटक के रूप में विश्वविख्यात है। तत्पश्चात उन्होंने चम्पू रामायण की रचना की, जो अपने गद्यकाव्य के लिए विख्यात है।

आईन-ए-अकबरी में प्राप्त उल्लेखों के अनुसार भोज की राजसभा में 500 विद्वान थे। इन विद्वानों में नौ (नौरत्न) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। महाराजा भोज ने अपने ग्रंथों में विमान बनाने की विधि का विस्तृत वर्णन किया है। इसी तरह उन्होंने नाव व बड़े जहाज बनाने की विधि का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने रोबोट तकनीक पर भी काम किया था।

मालवा के इस चक्रवर्ती, प्रतापी, काव्य और वास्तुशास्त्र में निपुण और विद्वान राजा राजा भोज के जीवन और कार्यों पर विश्व की अनेक यूनिवर्सिटीज में शोध कार्य हो रहा है।

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परमार / पवार वंशीय राजाओं ने मालवा के एक नगर धार को अपनी राजधानी बनाकर 8वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक राज्य किया था। उनके ही वंश में हुए परमार /पवार वंश के सबसे महान अधिपति महाराजा भोज ने धार में 1000 ईसवीं से 1055 ईसवीं तक शासन किया।

महाराजा भोज से संबंधित 1010 से 1055 ई. तक के कई ताम्रपत्र, शिलालेख और मूर्तिलेख प्राप्त होते हैं। भोज के साम्राज्य के अंतर्गत मालवा, कोंकण, खानदेश, भिलसा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़ एवं गोदावरी घाटी का कुछ भाग शामिल था। उन्होंने उज्जैन की जगह अपनी नई राजधानी धार को बनाया।

ग्रंथ रचना : राजा भोज खुद एक विद्वान होने के साथ-साथ काव्यशास्त्र और व्याकरण के बड़े जानकार थे और उन्होंने बहुत सारी किताबें लिखी थीं। मान्यता अनुसार भोज ने 64 प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की थीं तथा उन्होंने सभी विषयों पर 84 ग्रंथ लिखे जिसमें धर्म, ज्योतिष, आयुर्वेद, व्याकरण, वास्तुशिल्प, विज्ञान, कला, नाट्यशास्त्र, संगीत, योगशास्त्र, दर्शन, राजनीतिशास्त्र आदि प्रमुख हैं।

उन्होंने ‘समरांगण सूत्रधार’, ‘सरस्वती कंठाभरण’, ‘सिद्वांत संग्रह’, ‘राजकार्तड’, ‘योग्यसूत्रवृत्ति’, ‘विद्या विनोद’, ‘युक्ति कल्पतरु’, ‘चारु चर्चा’, ‘आदित्य प्रताप सिद्धांत’, ‘आयुर्वेद सर्वस्व श्रृंगार प्रकाश’, ‘प्राकृत व्याकरण’, ‘कूर्मशतक’, ‘श्रृंगार मंजरी’, ‘भोजचम्पू’, ‘कृत्यकल्पतरु’, ‘तत्वप्रकाश’, ‘शब्दानुशासन’, ‘राज्मृडाड’ आदि ग्रंथों की रचना की। ‘भोज प्रबंधनम्’ नाम से उनकी आत्मकथा है। हनुमानजी द्वारा रचित रामकथा के शिलालेख समुद्र से निकलवाकर धारा नगरी में उनकी पुनर्रचना करवाई, जो हनुमान्नाटक के रूप में विश्वविख्यात है। तत्पश्चात उन्होंने चम्पू रामायण की रचना की, जो अपने गद्यकाव्य के लिए विख्यात है।

आईन-ए-अकबरी में प्राप्त उल्लेखों के अनुसार भोज की राजसभा में 500 विद्वान थे। इन विद्वानों में नौ (नौरत्न) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। महाराजा भोज ने अपने ग्रंथों में विमान बनाने की विधि का विस्तृत वर्णन किया है। इसी तरह उन्होंने नाव व बड़े जहाज बनाने की विधि का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने रोबोट तकनीक पर भी काम किया था।

मालवा के इस चक्रवर्ती, प्रतापी, काव्य और वास्तुशास्त्र में निपुण और विद्वान राजा राजा भोज के जीवन और कार्यों पर विश्व की अनेक यूनिवर्सिटीज में शोध कार्य हो रहा है।

भोजशाला मूल रूप से एक मा सरस्वती मंदिर के तौर पर स्थापित था, जिसे राजा भोज ने बनवाया था। लेकिन जब अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का सुल्तान बना तो यह क्षेत्र उसके साम्राज्य में मिल गया। उसने इस मंदिर को मस्जिद में तब्दील करवा दिया। भोजशाला मस्जिद में संस्कृत में अनेक अभिलेख खुदे हुए हैं जो इसके इसके मंदिर होने की पुष्टि करते हैं। हाल ही में 15 फरवरी 2013 को यहां आंदोलन हुआ है। इसमें 97 लोग पुलिस की लाठीचार्ज से घायल है। मां वाग्देफवी की प्रतिमा भारत लाने के लिए लंदन की कोर्ट में सुब्रमण्य म स्वाामी ने एक याचिका दायर की है।

ऐतिहासिक भोजशाला में प्रतिवर्ष बासंती वातावरण में बसंत पंचमी पर सरस्वती के आराधकों का मेला लगता है। दरअसल यह ऐसा स्थान है, जहाँ माँ सरस्वती की विशेष रूप से इस दिन पूजा-अर्चना होती है। यहाँ यज्ञ वेदी में आहुति और अन्य अनुष्ठान इस स्थल के पुराने समय के वैभव का स्मरण कराते हैं। साथ ही इतिहास भी जीवंत हो उठता है। परमार काल का वास्तु शिल्प का यह अनुपम प्रतीक है।

ग्रंथों के अनुसार राजा भोज माँ सरस्वती के उपासक थे। उनके काल में सरस्वती की आराधना का विशेष महत्व था। ऐसा कहा जाता है कि उनके काल में जनसाधारण तक संस्कृत का विद्वान हुआ करता था। इसलिए धार संस्कृत और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। भोज सरस्वती की कृपा से ही योग, सांख्य, न्याय, ज्योतिष, धर्म, वास्तुशास्त्र, राज-व्यवहार शास्त्र सहित कई शास्त्रों के ज्ञाता रहे।

उनके द्वारा लिखे गए ग्रंथ आज भी प्रासंगिक हैं। इतिहास के पन्नों में यह बात दर्ज है कि परमार/पँवार/पवार वंश के सबसे महान अधिपति राजा भोज का धार में 1000 ईसवीं से 1055 ईसवीं तक प्रभाव रहा, जिससे कि यहाँ की कीर्ति दूर-दूर तक पहुँची। राजा भोज के विद्वानों के आश्रयदाता थे। उन्होंने धार में एक महाविद्यालय की स्थापना की थी, जो बाद में भोजशाला के नाम से विख्यात हुई।

जहाँ सुंदर तथा निकट स्थानों से विद्यार्थी अपनी ज्ञान पिपासा शांत करने के लिए आते थे। उस काल के साहित्य में इस नगर का उल्लेख धार तथा उसके शासक का यशोगान ही किया गया है।

राजा भोज के काल में सरस्वती की आराधना का विशेष महत्व था। जनसाधारण तक संस्कृत का विद्वान हुआ करता था। भोज सरस्वती की कृपा से ही योग, सांख्य, न्याय, ज्योतिष, धर्म, वास्तुशास्त्र, राज-व्यवहार शास्त्र सहित कई शास्त्रों के ज्ञाता रहे।

स्थापत्य व वास्तु शिल्प -भोजशाला एक बड़े खुले प्रांगण में बनी है तथा सामने एक मुख्य मंडल और पार्श्व में स्तंभों की श्रंखला तथा पीछे की ओर एक विशाल प्रार्थना घर है। नक्काशीदार स्तंभ तथा प्रार्थना गृह की उत्कृष्ट नक्काशीदार छत भोजशाला की विशिष्ट पहचान है। दीवारों में लगे उत्कीर्णित शिला पट्टों से बहुमूल्य कृतियाँ प्राप्त हुई हैं। वास्तु के लिए बेजोड़ इस स्थान पर दो शिलालेख विशाल काले पत्थर के हैं। इन शिलालेखों पर क्लासिकी संस्कृत में नाटक उत्कीर्णित है। इसे अर्जुन वर्मा देव के शासनकाल में उत्कीर्णित किया गया था।

इस काव्यबद्घ नाटक की रचना राजगुरु मदन द्वारा की गई थी। जो विख्यात जैन विद्वान आशाधर का शिष्य था, जिन्होंने परमारों के राज दरबार को सुशोभित किया था और मदन को संस्कृत काव्य शिक्षा दी थी। इस नाटक का नायक पूर्रमंजरी है। यह धार के बसंतोत्सव में अभिनीत किए जाने के लिए लिखा गया था। भोजशाला में स्तंभों पर धातु प्रत्यय माला व वर्णमाला अंकित है। स्थापत्य कला के लिहाज से भोजशाला एक महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है

वाग्देवी का मंदिर

यहाँ पर कभी माँ सरस्वती यानी वाग्देवी का मंदिर था। जिसका कवि मदन ने अपने नाटक में उल्लेख किया है। यह प्रतिमा भव्य व विशाल थी। यहाँ की देवी प्रतिमा अंग्रेज अपने साथ लंदन ले गए, जो आज भी लंदन के संग्रहालय में मौजूद है। इस प्रतिमा की राजा भोज द्वारा आराधना की जाती थी। वर्ष में केवल एक बार बसंत पंचमी पर भोजशाला में माँ सरस्वती का तैलचित्र ले जाया जाता है, जिसकी आराधना होती है। बसंत पंचमी पर कई वर्षों से उत्सव आयोजित हो रहे हैं। इसके लिए एक समिति गठित है। मां वाग्देहवी की प्रतिमा भारत लाने के लिए लंदन की कोर्ट में सुब्रमण्यिम स्वाकमी ने एक याचिका दायर की है।

ग्वालियर से मिले राजा भोज के स्तुति पत्र के अनुसार केदारनाथ मंदिर का राजा भोज ने 1076 से 1099 के बीच पुन: निर्माण कराया था। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार यह मंदिर 12-13वीं शताब्दी का है। इतिहासकार डॉ. शिव प्रसाद डबराल मानते हैं कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं तब भी यह मंदिर मौजूद था।

कुछ विद्वान मानते हैं कि महान राजा भोज (भोजदेव) का शासनकाल 1010 से 1053 तक रहा। राजा भोज ने अपने काल में कई मंदिर बनवाए। राजा भोज के नाम पर भोपाल के निकट भोजपुर बसा है। धार की भोजशाला का निर्माण भी उन्होंने कराया था। कहते हैं कि उन्होंने ही मध्यप्रदेश की वर्तमान राजधानी भोपाल को बसाया था जिसे पहले भोजपाल कहा जाता था।

भोज के निर्माण कार्य : मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक गौरव के जो स्मारक हमारे पास हैं, उनमें से अधिकांश राजा भोज की देन हैं, चाहे विश्वप्रसिद्ध भोजपुर मंदिर हो या विश्वभर के शिवभक्तों के श्रद्धा के केंद्र उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर, धार की भोजशाला हो या भोपाल का विशाल तालाब- ये सभी राजा भोज के सृजनशील व्यक्तित्व की देन हैं। उन्होंने जहां भोज नगरी (वर्तमान भोपाल) की स्थापना की वहीं धार, उज्जैन और विदिशा जैसी प्रसिद्ध नगरियों को नया स्वरूप दिया। उन्होंने केदारनाथ, रामेश्वरम्, सोमनाथ, मुण्डीर आदि मंदिर भी बनवाए, जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर हैं।

राजा भोज ने शिव मंदिरों के साथ ही सरस्वती के मंदिरों का भी निर्माण किया। राजा भोज ने धार, मांडव तथा उज्जैन में सरस्वतीकण्ठभरण नामक भवन बनवाए थे जिसमें धार में ‘सरस्वती मंदिर’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। एक अंग्रेज अधिकारी सीई लुआर्ड ने 1908 के गजट में धार के सरस्वती मंदिर का नाम ‘भोजशाला’ लिखा था। पहले इस मंदिर में मां वाग्देवी की मूर्ति होती थी। मुगलकाल में मंद‍िर परिसर में मस्जिद बना देने के कारण यह मूर्ति अब ब्रिटेन के म्यूजियम में रखी है।

केदारनाथ मंदिर का निर्माण

केदारनाथ मंदिर का परिचय और इतिहास :- उत्तराखंड में स्थित बारह ज्योतिर्लिंग में से एक केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति और मंदिर के निर्माण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। इस मंदिर को सर्वप्रथम किसने बनाया इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, लेकिन ज्ञात इतिहास अनुसार 3500 ईसापूर्व पांडवों ने इसका निर्माण किया, फिर 8वीं सदी में शंकराचार्य ने और बाद में 10वीं सदी के मध्य में इसका पुन:निर्माण कराया मालवा के राजा भोज ने।

गिरिराज हिमालय की केदार नामक चोटी पर स्थित है देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग। केदारनाथ धाम और मंदिर तीन तरफ पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ, दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड। न सिर्फ तीन पहाड़ बल्कि पांच ‍नदियों का संगम भी है यहां- मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी। इन नदियों में से कुछ का अब अस्तित्व नहीं रहा लेकिन अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी आज भी मौजूद है। इसी के किनारे है केदारेश्वर धाम। यहां सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी रहता है।

यह उत्तराखंड का सबसे विशाल शिव मंदिर है, जो कटवां पत्थरों के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। ये शिलाखंड भूरे रंग के हैं। मंदिर लगभग 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर बना है। इसका गर्भगृह अपेक्षाकृत प्राचीन है जिसे 80वीं शताब्दी के लगभग का माना जाता है।

मंदिर के गर्भगृह में अर्धा के पास चारों कोनों पर चार सुदृढ़ पाषाण स्तंभ हैं, जहां से होकर प्रदक्षिणा होती है। अर्धा, जो चौकोर है, अंदर से पोली है और अपेक्षाकृत नवीन बनी है। सभामंडप विशाल एवं भव्य है। उसकी छत चार विशाल पाषाण स्तंभों पर टिकी है। विशालकाय छत एक ही पत्थर की बनी है। गवाक्षों में आठ पुरुष प्रमाण मूर्तियां हैं, जो अत्यंत कलात्मक हैं।

85 फुट ऊंचा, 187 फुट लंबा और 80 फुट चौड़ा है केदारनाथ मंदिर। इसकी दीवारें 12 फुट मोटी हैं और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है। यह आश्चर्य ही है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर तराशकर कैसे मंदिर की शक्ल ‍दी गई होगी। खासकर यह विशालकाय छत कैसे खंभों पर रखी गई। पत्थरों को एक-दूसरे में जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। यह मजबूती और तकनीक ही मंदिर को नदी के बीचोबीच खड़े रखने में कामयाब हुई है।

मंदिर का निर्माण इतिहास : पुराण कथा अनुसार हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित है।

यह मंदिर मौजूदा मंदिर के पीछे सर्वप्रथम पांडवों ने बनवाया था, लेकिन वक्त के थपेड़ों की मार के चलते यह मंदिर लुप्त हो गया। बाद में 8वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने एक नए मंदिर का निर्माण कराया, जो 400 वर्ष तक बर्फ में दबा रहा।

राहुल सांकृत्यायन के अनुसार ये मंदिर 12-13वीं शताब्दी का है। इतिहासकार डॉ. शिव प्रसाद डबराल मानते हैं कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं, तब भी यह मंदिर मौजूद था। माना जाता है कि एक हजार वर्षों से केदारनाथ पर तीर्थयात्रा जारी है। कहते हैं कि केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्राचीन मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था। बाद में अभिमन्यु के पौत्र जनमेजय ने इसका जीर्णोद्धार किया था।

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